उत्तर प्रदेश जमींदारी एवं भूमि सुधार विधेयक पारित कराया, जिसने उन्हें गांवों और किसानों के प्रतिनिधि के रूप में मजबूती से स्थापित कर दिया और जिसे उनके राजनितिक जीवन की प्रमुख उपलब्धि माना गया।

१९५२

उत्तर प्रदेश ज़मींदरी एवं भूमि सुधार विधेयक पारित कराया, जिसने उन्हें गांवों और किसानों के प्रतिनिधि के रूप में मजबूती से स्थापित कर दिया और जिसे उनके राजनितिक जीवन की प्रमुख उपलब्धि मन गया। इस कानून को गांवों में लिए उन्होंने सारे राज्य के तूफानी दौरे किये, विशेषकर पूर्वी भागों में, जहाँ जमींदारी प्रथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अपेक्षा व्यापक रूप से मौजूद थी और शोषणकारी थी। उन्होंने जेड.ए. एल.आर. के समर्थन में आल इंडिया रेडियो रेडियो पर अनेक भाषण दिए, विभिन्न समाचार-पत्रों में लेख लिखे।

उन्होंने २० मई १९५२ को राजस्व एवं कृषि मंत्री (दो अंतःसम्बद्ध एवं महत्वपूर्ण मंत्रालय) नियुक्त किया गया। २७ दिसंबर १९५४ तक उन्होंने इस मंत्रालय का दायित्व सम्हाला।

राज्य में राजस्व विभाग में अग्रिम पंक्ति के कर्मचारी पटवारियों ने अपनी सेवा शर्तों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए, ज़मींदारों के प्रच्छन्न समर्थन से राज्यव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया। चरण सिंह ने उनकी बाध्यकारी मांगों को मानाने से इंकार कर दिया और सभी २७००० पटवारियों की सेवाएं समाप्त कर त्वरित कार्यवाही करने वाले एवं सख्त प्रशासनिक क्षमताओं वाले नेता की छवि स्थापित की। उन्होंने पटवारियों की जगह लेखपालों का पद सृजित किया, जो चुनी हुई ग्राम सभाओं के प्रति जवाबदेह थे और १८% पदों पर अनुसूचित जाती के लोगों की नियुक्ति के निर्देश दिया। यद्यपि वांछित शिक्षित अभ्यार्थियों के अभाव में अनुसूचित जाती से मात्र ५% ही लेखपाल भर्ती किये जा सके।

"आन्दोलनकारियों की राय थी कि यदि वे अपनी मांगों पर डटे रहे तो एक दिन जीत उनकी ही होगी। ऐसे हालात में, सही रुख, जो सरकार को अपनाना चाहिए, वह यह है कि यदि उसके कर्मचारियों की मांगें या हमारे समाज के किसी भी हिस्से.......... उचित है, सरकार के संज्ञान में लेन पर उन्हें शीघ्रतिशीघ्र स्वीकार कर लिया जाये। यदि मांगें अनुचित हैं, उन्हें कतई नहीं मन जायेगा....... हड़ताल, सत्याग्रह या आन्दोलन के किसी तौर-तरीके के बावजूद....... नेतृत्व के बिना लोकतंत्र अराजकता है" राज्य कर्मचारियों के आंदोलन के मुद्दे पर २१ अप्रैल १९६७ को चरण सिंह की टिप्पणी।